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Bihar News: पंचायत सचिवों के तबादले पर घमासान, 1402 की सूची के बाद उठे गंभीर सवाल

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहार में पंचायत सचिवों के तबादले को लेकर विवाद बढ़ गया है। तबादला सूची में कथित गड़बड़ियों, पात्र कर्मचारियों को प्राथमिकता नहीं मिलने और 603 नाम छूटने के आरोपों ने विभागीय व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।

पटना, 20 अगस्त। बिहार में पंचायत सचिवों के तबादले का मामला अब केवल स्थानांतरण और पदस्थापन तक सीमित नहीं रह गया है। तबादला प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के आरोपों ने पंचायती राज विभाग की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य में पंचायत स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी माने जाने वाले पंचायत सचिवों के बीच असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

विवाद की सबसे बड़ी वजह हाल में जारी की गई तबादला सूची है। आरोप है कि सूची तैयार करने में ऐसे नाम भी शामिल हो गए, जो कर्मचारी अब सेवा में नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ जिन कर्मचारियों को नियमों के अनुसार प्राथमिकता मिलने की उम्मीद थी, उनके मामलों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा पैदा कर दी है। विभागीय मंत्री की ओर से सूची में गड़बड़ियों की बात स्वीकार किए जाने के बाद अब पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर नजर है।

2014 की भर्ती से शुरू हुई कहानी

पंचायत सचिवों के तबादले से जुड़ा विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ है। इसकी पृष्ठभूमि करीब एक दशक पुरानी है।

वर्ष 2014 में पंचायती राज विभाग ने पंचायत सचिवों के लगभग 3100 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया था। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने में लंबा समय लगा और नियुक्ति का चरण वर्ष 2022 तक पहुंचा।

चूंकि भर्ती का मूल विज्ञापन 2014 का था, इसलिए नियुक्ति के समय महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया। नियुक्ति के बाद करीब 2500 पंचायत सचिवों को उनके गृह जिले से अलग जिलों में पदस्थापित किया गया।

इससे कई कर्मचारियों की परेशानी बढ़ गई। कुछ कर्मियों को अपने गृह जिले से करीब 300 किलोमीटर तक दूर पदस्थापित किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद बिहार राज्य पंचायत सचिव संघ ने स्थानांतरण व्यवस्था में बदलाव की मांग शुरू की।

2025 में बनी नई स्थानांतरण व्यवस्था

लगातार उठती मांगों के बीच विभाग ने पंचायत सचिवों के लिए नई स्थानांतरण एवं पदस्थापन विनियमावली तैयार की। वर्ष 2025 में इसे अधिसूचित किया गया।

इसके बाद अगस्त 2025 में पदस्थापन संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए गए। इसमें कर्मचारियों की परिस्थितियों के आधार पर प्राथमिकता तय की गई।

प्राथमिकता के क्रम में दिव्यांग कर्मचारी, महिला कर्मचारी, गंभीर बीमारी से पीड़ित कर्मी, पति-पत्नी से जुड़े मामले और गृह जिले से दूरी जैसे आधार शामिल किए गए।

कर्मचारियों से तीन विकल्प लेकर स्थानांतरण प्रक्रिया के लिए आवेदन भी मंगाए गए। बताया जाता है कि कुल 2248 पंचायत सचिवों ने इसके लिए आवेदन किया।

यहीं से उम्मीद जगी कि लंबे समय से चली आ रही स्थानांतरण संबंधी समस्या का समाधान हो सकेगा। लेकिन बाद की सूचियों ने विवाद को खत्म करने के बजाय और बढ़ा दिया।

विधानसभा और विधान परिषद तक पहुंचा मामला

पंचायत सचिवों के स्थानांतरण का मुद्दा बिहार विधानमंडल तक भी पहुंचा। विधान परिषद में सदस्यों की ओर से इस व्यवस्था पर सवाल उठाए गए।

तबादले की प्राथमिकता तय करने के बावजूद कुछ ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया, जिनमें पात्र कर्मचारियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिलने की शिकायत थी।

एक मामले में दिव्यांग महिला कर्मचारी के स्थानांतरण को लेकर भी सवाल उठाए गए। इससे विभाग की ओर से तय किए गए प्राथमिकता मानकों के वास्तविक अनुपालन पर सवाल उठने लगे।

243 कर्मियों की सूची से भी नहीं थमा विवाद

फरवरी 2026 में विभाग की ओर से 243 पंचायत सचिवों की तबादला सूची जारी की गई। लेकिन यह सूची भी विवादों से बच नहीं सकी।

पति-पत्नी के आधार पर स्थानांतरण के प्रावधान को लेकर भी सवाल उठे। आरोप लगाया गया कि इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए ऐसे मामलों को भी शामिल किया गया, जहां पति निजी कंपनी में काम कर रहा था।

इसके बाद कर्मचारियों और संघ की ओर से नियमों के समान इस्तेमाल की मांग और तेज हुई।

गंभीर बीमारी वाले कर्मचारियों के मामले ने उठाए सवाल

6 अप्रैल 2026 को गंभीर बीमारियों से पीड़ित पंचायत सचिवों के तबादले की प्रक्रिया सामने आई। इसके बाद जिलाधिकारियों को संबंधित कर्मचारियों की बीमारी की जांच कराने के लिए पत्र भेजा गया।

यहीं प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हुए। कर्मचारियों का तर्क था कि यदि बीमारी के आधार पर प्राथमिकता तय करनी थी तो पहले सत्यापन किया जाना चाहिए था।

बाद में 4 जुलाई को विभाग ने पत्र जारी कर कहा कि निर्धारित समय तक जिलाधिकारी की रिपोर्ट नहीं आने पर संबंधित कर्मचारियों को स्वतः विरमित माना जाएगा।

इस घटनाक्रम ने विभागीय प्रक्रिया के क्रम पर सवाल खड़े किए—पहले तबादला और बाद में बीमारी की जांच क्यों?

1402 नामों की सूची ने बढ़ाया विवाद

विवाद का सबसे ताजा और बड़ा चरण 7 अगस्त 2026 को सामने आया, जब विभाग ने 1402 पंचायत सचिवों की तबादला सूची जारी की।

संघ और कर्मचारियों की ओर से आरोप लगाया गया कि सूची में कुछ ऐसे नाम भी शामिल हो गए, जो अब सेवा में नहीं हैं।

खुसरुपुर से जुड़े एक मामले का उदाहरण देते हुए दावा किया गया कि जिस कर्मचारी की सूची में नाम था, उसकी मृत्यु सूची जारी होने से लगभग ढाई महीने पहले हो चुकी थी।

यदि यह दावा सही है तो इससे सूची तैयार करने की प्रक्रिया में रिकॉर्ड सत्यापन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

इसके अलावा गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों और जरूरतमंद महिला कर्मियों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलने के आरोप भी लगाए गए हैं।

2248 के मुकाबले 1645 नाम क्यों?

पूरे विवाद का एक अहम बिंदु कर्मचारियों की संख्या को लेकर भी सामने आया है।

संघ का दावा है कि समझौते के अनुसार 2248 पंचायत सचिवों के तबादले की प्रक्रिया होनी थी, लेकिन विभाग की सूची में केवल 1645 नाम शामिल किए गए।

इस तरह कथित तौर पर 603 कर्मचारी सूची से बाहर रह गए।

संघ की ओर से यह भी दावा किया गया है कि छूटे हुए कर्मचारियों में करीब 200 एससी/एसटी वर्ग से जुड़े कर्मी हैं। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।

गृह जिले और आसपास के जिलों की मांग

पंचायत सचिव संघ का कहना है कि सरकार के साथ हुए समझौते में कर्मचारियों को गृह जिले या आसपास के दो जिलों में स्थानांतरित करने की बात तय हुई थी।

लेकिन संघ का आरोप है कि कई कर्मचारियों को इसके बावजूद काफी दूर के जिलों में भेज दिया गया।

संघ की ओर से महिला पंचायत सचिव सुरुचि कुमारी को शेखपुरा, मुकेश कुमार को कटिहार और रोशन को अररिया भेजे जाने जैसे उदाहरण सामने रखे गए हैं।

इन मामलों को आधार बनाकर संघ पूरी सूची की समीक्षा की मांग कर रहा है।

मंत्री ने मानी गड़बड़ी, जांच का भरोसा

तबादला सूची को लेकर बढ़ते विवाद के बीच पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की ओर से सूची में गड़बड़ियों को स्वीकार किए जाने की बात सामने आई है।

मंत्री ने अधिकारियों की लापरवाही की जांच कराने और सूची में आवश्यक सुधार का भरोसा दिया है।

हालांकि पंचायत सचिव संघ का कहना है कि केवल आश्वासन से समस्या खत्म नहीं होगी। संघ की मांग है कि पूरी सूची की दोबारा जांच हो और नियमों के अनुसार पात्र कर्मचारियों को उनका अधिकार मिले।

अब आंदोलन की तैयारी

लगातार उठ रहे सवालों के बीच पंचायत सचिव संघ ने फिर आंदोलन का संकेत दिया है। संघ का कहना है कि अगर मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो राज्य स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।

इससे सरकार के सामने दोहरी चुनौती पैदा हो गई है। एक तरफ तबादला प्रक्रिया को लेकर कर्मचारियों का असंतोष दूर करना है, तो दूसरी तरफ विभागीय स्तर पर तैयार की गई सूचियों की विश्वसनीयता कायम करनी है।

पंचायत सचिव पंचायत स्तर पर सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए लंबे समय तक चलने वाला विवाद सीधे पंचायतों के कामकाज को भी प्रभावित कर सकता है।

अब आगे क्या?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि विभाग कथित गड़बड़ियों वाली सूची की किस तरह समीक्षा करता है। क्या मृत, निलंबित या सेवा छोड़ चुके कर्मचारियों के नामों की जांच होगी? क्या छूटे हुए 603 कर्मचारियों के मामलों पर दोबारा विचार किया जाएगा? और क्या दिव्यांग, महिला तथा गंभीर बीमारी से पीड़ित कर्मचारियों को तय प्राथमिकता के अनुसार स्थान मिलेगा?

इन सवालों का जवाब विभाग की अगली कार्रवाई से मिलेगा।

पंचायत सचिवों का यह विवाद सिर्फ कर्मचारियों के स्थानांतरण का मामला नहीं है। यह सरकारी नियमों के पालन, प्रशासनिक पारदर्शिता और विभागीय निर्णयों पर कर्मचारियों के भरोसे से भी जुड़ा है।

अगर विभाग समयबद्ध तरीके से पूरी सूची की समीक्षा कर पात्र कर्मचारियों की शिकायतों का समाधान करता है तो विवाद को खत्म किया जा सकता है। लेकिन अगर शिकायतें लंबी खिंचती हैं तो पंचायत सचिवों का आंदोलन और तेज हो सकता है।

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तबादला सूची से बड़ा है भरोसे का सवाल

पंचायत सचिवों के स्थानांतरण का विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि सरकारी नियम आखिर किसके लिए बनाए जाते हैं। अगर विभाग किसी कर्मचारी की दिव्यांगता, बीमारी या पारिवारिक परिस्थिति को प्राथमिकता देने का नियम बनाता है, तो उसका पालन भी उसी गंभीरता से होना चाहिए।

तबादला सरकारी सेवा का सामान्य हिस्सा है, लेकिन पारदर्शी प्रक्रिया उसका आधार होनी चाहिए। किसी कर्मचारी को सैकड़ों किलोमीटर दूर भेजना उसके परिवार, बच्चों की शिक्षा और व्यक्तिगत जीवन पर सीधा असर डाल सकता है।

वहीं सूची में मृत या सेवा से बाहर हो चुके कर्मचारियों के नाम आने का आरोप सही है तो यह केवल एक गलती नहीं, बल्कि रिकॉर्ड सत्यापन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल है।

सरकार को अब बयान या आश्वासन से आगे बढ़कर शिकायतों का तथ्यात्मक समाधान करना चाहिए। हर कर्मचारी के मामले की जांच हो और यह स्पष्ट किया जाए कि किस आधार पर किसका स्थानांतरण हुआ।

पंचायत सचिवों का भरोसा बहाल करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यही कर्मचारी गांव स्तर पर सरकारी व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। अगर वही कर्मचारी अपनी पदस्थापना प्रक्रिया को लेकर असंतुष्ट और असुरक्षित महसूस करेंगे तो इसका असर पंचायतों के कामकाज पर भी पड़ सकता है।

इसलिए अब सरकार के सामने चुनौती केवल तबादला सूची सुधारने की नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाकर भरोसा वापस लाने की है।

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